DVC Maithon Street Light Crisis: आम सड़कों पर अंधेरा, अधिकारियों के बंगलों पर रोशनी को लेकर उठे दोहरे सिस्टम के सवाल
DVC Maithon Street Light Crisis : मैथन के डीवीसी आवासीय परिसर में महीनों से खराब स्ट्रीट लाइटों को लेकर नाराजगी, नई लाइटें स्टोर में होने के बावजूद आम सड़कों पर अंधेरा रहने का आरोप
DVC Maithon Street Light Crisis :मैथन के डीवीसी आवासीय परिसर में स्ट्रीट लाइट व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि कई मुख्य सड़कों की स्ट्रीट लाइटें लंबे समय से खराब हैं और नई लाइटों की सामग्री उपलब्ध होने के बावजूद उन्हें लगाने में देरी की जा रही है। वहीं, अधिकारियों के आवासों के आसपास रोशनी की व्यवस्था को लेकर कथित तौर पर प्राथमिकता दिए जाने के आरोप सामने आए हैं।
DVC Maithon Street Light Crisis : एक ही परिसर, एक ही प्रबंधन और एक ही व्यवस्था की जिम्मेदारी…लेकिन अगर सुविधाओं में फर्क दिखाई देने लगे तो सवाल उठना लाजिमी है। झारखंड के मैथन स्थित डीवीसी आवासीय परिसर में स्ट्रीट लाइट व्यवस्था को लेकर इन दिनों ऐसा ही सवाल खड़ा हो रहा है। आरोप है कि आवासीय परिसर की कई महत्वपूर्ण सड़कों पर महीनों से स्ट्रीट लाइटें खराब पड़ी हैं, जिसके कारण शाम होते ही लोगों को अंधेरे में आवाजाही करनी पड़ रही है। दूसरी ओर, अधिकारियों के बंगलों और कुछ चुनिंदा आवासीय क्षेत्रों के आसपास पर्याप्त रोशनी दिखाई देने का दावा किया जा रहा है।
मामला सिर्फ खराब स्ट्रीट लाइट का नहीं है। स्थानीय लोगों के आरोपों के मुताबिक, नई स्ट्रीट लाइटों की खरीद के लिए टेंडर प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और संबंधित सामग्री डीवीसी के स्टोर तक पहुंच भी चुकी है। इसके बावजूद आम कर्मचारियों और उनके परिवारों की आवाजाही वाली सड़कों पर नई लाइटें लगाने में कथित तौर पर देरी की जा रही है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब लाइटें उपलब्ध हैं, तो उन्हें लगाया क्यों नहीं जा रहा?
मानसून के दौरान यह समस्या और गंभीर हो जाती है। शाम ढलने के बाद परिसर की कई सड़कें अंधेरे में डूब जाती हैं। सड़क किनारे उगी झाड़ियां, जगह-जगह जलभराव और कम रोशनी के कारण लोगों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
सबसे ज्यादा चिंता बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर जताई जा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि रात के समय पैदल चलने वालों के साथ-साथ दोपहिया वाहन चालकों के लिए भी अंधेरी सड़कें जोखिम पैदा करती हैं। बारिश के मौसम में झाड़ियों और जलजमाव वाले इलाकों में सांप-बिच्छू जैसे जहरीले जीवों का खतरा भी बना रहता है।
ऐसे में सवाल उठता है कि यदि किसी व्यक्ति के साथ अंधेरे के कारण दुर्घटना हो जाती है या कोई गंभीर घटना घटती है, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? क्या किसी हादसे के बाद व्यवस्था दुरुस्त करने का इंतजार किया जाएगा या उससे पहले ही सुरक्षा के इंतजाम किए जाएंगे?
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बिंदु नई स्ट्रीट लाइटों को लेकर सामने आ रहा है। स्थानीय निवासियों का दावा है कि नई लाइटों की खरीद के लिए टेंडर प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और सामग्री डीवीसी के स्टोर में पहुंच चुकी है। यदि यह दावा सही है, तो फिर सवाल और गंभीर हो जाता है।
लोग पूछ रहे हैं कि जब नई लाइटें खरीदी जा चुकी हैं और परिसर में उपलब्ध हैं, तो उनका उपयोग खराब पड़ी स्ट्रीट लाइटों को बदलने में क्यों नहीं किया जा रहा? आखिर किस प्रक्रिया के तहत यह तय किया जा रहा है कि किस इलाके में पहले लाइट लगेगी और किस इलाके को अंधेरे में रखा जाएगा?
स्थानीय लोगों के अनुसार, कुछ क्षेत्रों में लाइट लगाने को लेकर तेजी दिखाई जाती है, जबकि आम कर्मचारियों के आवासीय इलाकों में शिकायतों के बावजूद अपेक्षित कार्रवाई नहीं होती।
यही आरोप इस पूरे मामले को और संवेदनशील बना देता है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि वरीय अधिकारियों के बंगलों तथा कैंप पावर हाउस से जुड़े अधिकारियों-कर्मचारियों के आवासों के आसपास रोशनी की व्यवस्था अपेक्षाकृत बेहतर है। वहीं, अन्य कर्मचारियों के आवासीय क्षेत्रों और आम आवाजाही वाली सड़कों पर खराब स्ट्रीट लाइटों की समस्या बनी हुई है।
हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है। लेकिन यदि वास्तव में लाइट लगाने में क्षेत्र के आधार पर प्राथमिकता तय की जा रही है, तो डीवीसी प्रबंधन को इसकी स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए।
क्योंकि सवाल सिर्फ रोशनी का नहीं है, बल्कि समान सुविधा और समान सुरक्षा का है।
स्थानीय लोगों की शिकायतों के बीच कैंप पावर हाउस से जुड़े जिम्मेदार लोगों की ओर से कथित तौर पर यह तर्क दिए जाने की बात सामने आ रही है कि अभी बारिश का मौसम है और इस समय लाइट लगाने पर उनके खराब होने की आशंका है।
यदि ऐसा कहा गया है, तो इस तर्क पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।
लोगों का सवाल है कि अगर बारिश में नई स्ट्रीट लाइट लगाना उचित नहीं है, तो फिर कुछ अधिकारियों के आवासों के आसपास रोशनी की व्यवस्था कैसे की जा रही है? क्या वहां बारिश का असर नहीं होता? क्या वहां इस्तेमाल की जा रही लाइटें अलग तकनीक की हैं? या फिर बारिश का हवाला सिर्फ उन इलाकों के लिए दिया जा रहा है जहां आम कर्मचारी रहते हैं?
इन सवालों का जवाब डीवीसी प्रबंधन की ओर से दिया जाना जरूरी है, ताकि पूरे मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके।
डीवीसी का आवासीय परिसर सिर्फ अधिकारियों का नहीं है। यहां बड़ी संख्या में कर्मचारी और उनके परिवार रहते हैं। ऐसे में परिसर की बुनियादी सुविधाओं का लाभ सभी निवासियों को समान रूप से मिलना चाहिए।
स्ट्रीट लाइट केवल सुविधा नहीं, बल्कि सुरक्षा से जुड़ी बुनियादी व्यवस्था है। रात में पर्याप्त रोशनी होने से सड़क दुर्घटनाओं का खतरा कम होता है और लोगों को सुरक्षित आवाजाही में मदद मिलती है। अंधेरी सड़कों पर असामाजिक गतिविधियों और अन्य सुरक्षा संबंधी जोखिमों की आशंका भी बढ़ सकती है।
इसलिए खराब स्ट्रीट लाइट की शिकायत को सामान्य रखरखाव की समस्या मानकर लंबे समय तक टालना उचित नहीं माना जा सकता।
पूरे मामले को लेकर स्थानीय निवासियों और कर्मचारियों की ओर से कई सवाल उठाए जा रहे हैं—
अगर नई लाइटें स्टोर में पहुंच चुकी हैं तो उन्हें लगाया क्यों नहीं जा रहा?
अगर बारिश के कारण लाइट लगाना संभव नहीं है, तो कुछ इलाकों में रोशनी की व्यवस्था कैसे हो रही है?
क्या स्ट्रीट लाइट लगाने के लिए कोई प्राथमिकता सूची बनाई गई है?
क्या अधिकारियों और आम कर्मचारियों के आवासीय क्षेत्रों के लिए अलग-अलग मानक हैं?
खराब स्ट्रीट लाइटों की शिकायतों पर अब तक क्या कार्रवाई की गई?
नई खरीदी गई लाइटों का वितरण और उपयोग किस आधार पर किया जा रहा है?
इन सवालों का जवाब मिलने से न केवल कर्मचारियों की शंकाएं दूर होंगी, बल्कि व्यवस्था को लेकर उठ रहे आरोपों की भी वास्तविक तस्वीर सामने आएगी।
स्थानीय निवासियों ने डीवीसी के उच्च प्रबंधन से मामले में तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। लोगों की मांग है कि पूरे आवासीय परिसर में खराब स्ट्रीट लाइटों का सर्वे कराया जाए और जहां-जहां लाइटें खराब हैं, वहां बिना किसी भेदभाव के उन्हें जल्द से जल्द दुरुस्त या बदला जाए।
साथ ही नई स्ट्रीट लाइटों की खरीद, स्टॉक और वितरण की जानकारी भी सार्वजनिक करने की मांग उठ रही है। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि कितनी लाइटें खरीदी गईं, कितनी स्टोर में हैं और कितनी जगहों पर लगाई जा चुकी हैं।
यदि किसी क्षेत्र को प्राथमिकता दी गई है, तो उसके पीछे का कारण भी स्पष्ट किया जाना चाहिए।